Search
Thursday 9 July 2026
  • :
  • :
Latest Update

जब ईमानदारी नीव में हो तो ब्रिज किनारे नही पीढियां जोड़ते है। लोहे का नहीं, संकल्प से बना है हावड़ा ब्रिज

 

शीतल रॉय

कोलकाता, आज जब मैं कोलकाता के हावड़ा ब्रिज से गुज़री, तो अनायास ही लगा मानो मैं एक पुल पर नहीं, बल्कि इतिहास की धड़कनों पर चल रही हूँ। नीचे शांत बहती हुगली नदी और ऊपर लाखों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को जोड़ता यह अद्भुत पुल आज भी अडिग खड़ा है। यह केवल इंजीनियरिंग का नमूना नहीं, बल्कि उस युग की ईमानदारी, दूरदृष्टि और निर्माण संस्कृति का जीवंत प्रमाण है।
कहने को तो आज का दौर तकनीक का है। हमारे पास सुपरकंप्यूटर हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, अत्याधुनिक मशीनें हैं और सरकार के पास करोड़ों-अरबों रुपये की परियोजनाएँ हैं। फिर भी आए दिन किसी न किसी राज्य से खबर आती है कि नया पुल उद्घाटन से पहले ही दरक गया, कहीं से खबर आती है कि पुल कुछ महीनों में ढह गया, तो कहीं पहली बारिश भी नहीं झेल पाया। लेकिन यह हावड़ा ब्रिज है जो अपना इतिहास समेंटे अपनी जगह आज भी अचल है, हावड़ा ब्रिज दशकों से समय, मौसम, प्रदूषण, भारी यातायात और अनगिनत चुनौतियों का सामना करते हुए आज भी मजबूती से खड़ा है। मैं इसे केवल तकनीक की जीत नहीं मानती बल्कि गुणवत्ता, जिम्मेदारी और राष्ट्र के प्रति समर्पण की जीत है।
सवाल यह नहीं कि आज की तकनीक कमजोर है। सवाल यह है कि क्या आज निर्माण के पीछे वही निष्ठा, वही ईमानदारी और वही उत्तरदायित्व बचा है?आज के दौर में तकनीक जितनी आधुनिक हुई है, क्या हमारी कार्यसंस्कृति भी उतनी ही मजबूत हुई है? यदि उत्तर “हाँ” होता, तो करोड़ों की लागत से बने पुल कुछ वर्षों में नहीं ढह जाते।
यह हावड़ा ब्रिज हमें यह सिखाता है कि ऐतिहासिक निर्माण केवल मशीनों से नहीं, बल्कि चरित्र से होते हैं। हावड़ा ब्रिज का इतिहास इसलिए महान नहीं है कि वह पुराना है, बल्कि इसलिए कि उसने अपने काम अपनी गुणवत्ता से समय की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध किया है।
जब भी हावड़ा ब्रिज पर कदम पड़ते हैं, तो यह एहसास होता है कि विरासत केवल देखने की चीज़ नहीं होती, बल्कि हमारी सरकारों और देश की जनता को उससे सीखने की भी ज़रूरत होती है। यदि आधुनिक भारत को वास्तव में विश्वगुरु बनना है, तो केवल नई तकनीक अपनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि हमें उस ईमानदारी, गुणवत्ता और राष्ट्रहित की भावना को भी अपनाना होगा जिसने हावड़ा ब्रिज जैसी अमर धरोहरें खड़ी कीं।
क्योंकि इतिहास कागजो में नहीं, ऐसे पुलों में जीवित रहता है,जो अपनी गुणवत्ता ईमानदारी से केवल दो किनारों को नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ते हैं।




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *