मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बाद अब कलेक्टर शिवम वर्मा के गले में सोशल मीडिया की ट्रोलिंग तलवार…
इंदौर में दूषित पेयजल से हुई दुखद मौतों ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। यह केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे समय में आवश्यक है कि घटनाओं को राजनीतिक या वैचारिक टकराव का विषय बनाने के बजाय समाधान और सुधार की दिशा में देखा जाए।
इसी संदर्भ में कलेक्टर शिवम वर्मा एवं महापौर पुष्यमित्र भार्गव का संघ कार्यालय ‘सुदर्शन’ पहुँचना चर्चा का विषय बना। इस मुलाकात को लेकर सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की टिप्पणियाँ और ट्रोलिंग सामने आई, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रशासनिक अधिकारियों का समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद करना न तो उनकी संवैधानिक मर्यादा के विरुद्ध है, न ही इसे किसी दबाव की संकीर्ण दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी समाज में गहरी पैठ है। जनहित से जुड़े विषयों पर चिंता व्यक्त करना और संवाद करना उसका अधिकार और दायित्व दोनों हैं। इसे प्रशासन पर हस्तक्षेप या “तलब” करने के रूप में प्रस्तुत करना न तथ्यसंगत है और न ही संस्थागत गरिमा के अनुरूप।
वहीं कलेक्टर शिवम वर्मा जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी संविधान और कानून से बंधे हुए हैं। उनका किसी भी सामाजिक मंच पर जाकर संवाद करना प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचायक है। प्रशासन समाज से कटकर नहीं, समाज के साथ रहकर ही प्रभावी ढंग से कार्य कर सकता है।
दूषित जल की घटना यह स्पष्ट करती है कि यह किसी एक व्यक्ति या पद की लापरवाही का परिणाम नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद खामियों का संकेत है। ऐसे मामलों में प्राथमिकता होनी चाहिए निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और भविष्य के लिए मजबूत निगरानी तंत्र।
इंदौर देश के अग्रणी शहरों में शामिल है। उसकी पहचान केवल स्वच्छता रैंकिंग से नहीं, बल्कि माता अहिल्या की गौरव गाथा, प्रशासनिक दक्षता, सामाजिक समरसता और संस्थागत संतुलन से बनती है। इस संतुलन को बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कलेक्टर पर आरोप, ट्रोलिंग और जल्दबाजी में दिए गए निर्णय न तो पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाते हैं, न ही व्यवस्था को सुधारते हैं। सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस त्रासदी से सबक लेकर ऐसी ठोस व्यवस्था बनाई जाए, जिससे भविष्य में किसी को दूषित जल के कारण अपने प्राण न गंवाने पड़ें।
शीतल रॉय
