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Friday 17 April 2026
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क्या हमारा कॉर्पोरेट तंत्र सचमुच इतना कमजोर है

*आस्था का दबाव*

*या किसी एजेंडे की आग*

*राष्ट्र की बात*

शीतल रॉय ✍🏻

क्या हमारा कॉर्पोरेट तंत्र सचमुच इतना कमजोर हो गया है कि वहां काम करने वाले लोग अब अपने काम और काबलियत से ज्यादा धर्म, अपनी पहचान, आस्था और डर के बोझ तले दबने लगे हैं? या फिर हम एक ऐसे खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहां हर संवेदनशील मुद्दा सच से ज्यादा एजेंडा, बनकर पेश किया जा रहा है?
नासिक के Tata Consultancy Services (TCS) बीपीओ से उठे एक बवंडर ने इन सवालों को केवल जन्म ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें हमारे सामने निर्दयी और असहज की खामोशी के रूप में खड़ा भी कर दिया है।
अब अगर आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो यह सिर्फ एक कंपनी की चूक नहीं, बल्कि उस पूरे कॉर्पोरेट ढांचे की विफलता है, जो खुद को प्रोफेशनल,और न्यूट्रल कहता है। वह कार्यस्थल, जहां योग्यता और प्रदर्शन ही पहचान होनी चाहिए, अगर वहां भी धार्मिक दबाव, मानसिक टारगेटिंग और धर्म के आधार पर व्यक्तिगत हस्तक्षेप की गुंजाइश बन रही है,तो यह केवल कॉरपरेट नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन के साथ भी खिलवाड़ है।
और अगर ये आरोप एकतरफा, अतिरंजित या किसी छिपे एजेंडे का हिस्सा भी हैं, तब भी खतरा उतना ही बड़ा है,बल्कि मैं तो कहूंगी खतरा और भी बड़ा है। क्योंकि झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए आरोप सिर्फ एक व्यक्ति या संस्था को नहीं, बल्कि पूरे समाज के भरोसे को तोड़ते हैं। ऐसे मामले अविश्वास की ऐसी दीवार खड़ी करते हैं, जहां हर घटना को शक की नजर से देखा जाने लगता है।
सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है, जब सच और एजेंडा के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है और वह साफ नजर नही आती।
जब पीड़ित और आरोपी के बीच फर्क करने से पहले ही समाज अपने-अपने खेमों में बंट जाता है, तब यह समाज के लिए और भी घातक हो जाता है।
कॉर्पोरेट दफ्तर अगर विचारधाराओं के युद्धक्षेत्र बनेंगे, तो नुकसान सिर्फ कंपनियों का नहीं होगा, बल्कि यह देश की सामाजिक संरचना को भी अंदर से खोखला कर देगा। वहां काम करने वाला हर कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस करेगा वह ना सिर्फ अपने धर्म आस्था,करियर को लेकर, बल्कि अपनी पहचान को लेकर भी।
अब यह मामला केवल कानून का नहीं बल्कि चेतना का है।
अब जरूरत है सख्त जांच की, निष्पक्ष कार्रवाई की और उससे भी ज्यादा, समाज में संतुलन बनाए रखने की।
क्योंकि अगर हम हर मुद्दे को अपना धर्म बनाम उनका धर्म, नजर से देखेंगे,
तो आने वाले कल में सच भी हमारे पक्ष में नहीं खड़ा होगा।क्योकि …खामोशी, पक्षपात और जल्दबाजी, तीनों मिलकर उस आग के विकराल रूप को जन्म देती हैं,
जो सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि पूरे समाज को जला सकती है।




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