अगर दोषी नहीं थे केजरीवाल, तो जिम्मेदार कौन?
राष्ट्र की बात
शीतल रॉय ✍🏻
जांच एजेंसियों की साख पर उठते सवाल
सत्ता की मंशा पर बहस तेज, जेल में बीते वक्त की भरपाई कौन करेगा?
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शराब नीति घोटाले में अदालत द्वारा बरी किया जाना सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक तीखा सवाल है,और प्रहार भी..
लंबे समय तक चले इस मामले में केजरीवाल की गिरफ्तारी, पूछताछ और जेल में बिताए गए दिनों के बाद अब अदालत कहती है कि आरोप सिद्ध नहीं हुए क्योकि पर्याप्त सबूतों की कमी थी,तो सवाल यह है कि फिर यह पूरा घटनाक्रम किसके जिम्मे जाता है?
इस पूरे मामले ने एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या एक मुख्यमंत्री की समूची जांच
तथ्यों और सबूतों पर आधारित थी, या फिर किसी दबाव में दिशा तय की गई?
जब कोई बड़ा जनप्रतिनिधि महीनों तक जांच और पुलिस हिरासत का सामना करता है और अंत में बरी हो जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल पैदा हो जाता है।
और सत्ताधारी व्यवस्था पर प्रहार करता है।विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि अक्सर केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया जाता है। इस फैसले के बाद यह आरोप और तेज सिद्ध होते दिखाई दे रहे है।
क्या यह मामला भी उसी कड़ी का हिस्सा था?
क्या सत्ता के प्रभाव में किसी भी जनप्रतिनिधि की जांच की दिशा तय होती है?
ये सवाल अब और मुखर होंगे।क्योकि केजरीवाल का जो वक्त जेल में बीता उसकी भरपाई कौन करेगा?
सबसे बड़ा और सबसे असहज सवाल यही है।अगर अरविंद केजरीवाल दोषी नहीं थे, तो उनके जेल में बिताए गए समय की भरपाई कौन करेगा?
क्या कोई माफी?
य कोई जवाबदेही तय होगी।
या फिर यह मान लिया जाए कि सत्ता और सिस्टम की चक्की में पिसना ही “राजनीतिक जोखिम” है?
इस घटना का भविष्य पर क्या असर होगा क्या इसका फायदा विपक्ष को मिलेगा य फिर बड़ा नैरेटिव“राजनीतिक प्रताड़ना” का मुद्दा और मजबूत होगा
क्या अब जांच एजेंसियों की कार्यशैली और पारदर्शिता पर जवाबदेही की मांग तेज होगी।
आने वाले चुनावों में यह फैसला एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।क्योकि केजरीवाल की जीत का फैसला सिर्फ अदालत का नहीं, सिस्टम का आईना है।कोर्ट का यह निर्णय केवल एक केस का अंत नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का आईना है जिसमें आरोप पहले तय होते हैं और सबूत बाद में ढूंढे जाते हैं। लोकतंत्र व्यवस्था में कानून सर्वोपरि है, लेकिन जब निर्दोष साबित होने के बाद भी किसी को जेल की सलाखों के पीछे समय बिताना पड़े, तो यह सवाल उठना लाज़मी है। की केजरीवाल के बरी होने का फैसला ही अगर न्याय है, तो उसके पहले की पूरी प्रक्रिया भी उतनी ही न्यायपूर्ण होनी चाहिए?
