राष्ट्र की बात
शीतल रॉय
12 जनवरी यानी युवा दिवस यह दिन केवल स्वामी विवेकानंद की जयंती नहीं, बल्कि उस सनातन चेतना का स्मरण है जिसने भारत के युवाओं को आत्मबोध, आत्मबल और आत्मगौरव का मार्ग दिखाया। स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के ऐसे महापुरुष हैं, जिनका चिंतन काल, परिस्थिति और पीढ़ियों से परे आज भी उतना ही प्रखर और प्रासंगिक है। युवा दिवस वास्तव में उस शक्ति का उत्सव है जो सनातन संस्कारों से जन्म लेकर राष्ट्रनिर्माण की धुरी बनती है।
स्वामी विवेकानंद का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की वैज्ञानिक और आत्मिक व्यवस्था है। उन्होंने वेदांत को ग्रंथों से निकालकर जीवन और कर्मभूमि में उतारा। शिकागो के विश्व धर्म संसद में उनका ओजस्वी उद्घोष—“मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों”—केवल भाषण नहीं था, वह भारत की आत्मा की गर्जना थी। उस दिन भारत ने विश्व को बताया कि हमारी संस्कृति सहिष्णुता, समरसता और आत्मबल की संस्कृति है।
आज का भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। तकनीक क्रांति के युग में युवा सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ा उत्तरदायित्व भी। क्योकि दिशाहीन ऊर्जा राष्ट्र के लिए घातक हो भी सकती है, और सही मार्गदर्शन राष्ट्र को शिखर तक पहुंचा सकता है। स्वामी विवेकानंद का संदेश स्पष्ट था की मजबूत शरीर, निर्मल चरित्र और निर्भीक मन। वे कहते थे कि कमजोर नसों में सनातन चेतना का प्रवाह संभव नहीं। इसलिए उन्होंने युवाओं को केवल साधु नहीं, कर्मयोगी बनने का आह्वान किया।
आज जब राजनीति का चोला ओढ़े कुछ बाहरी शक्तियां भारत की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं, तब विवेकानंद का विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। सनातन मूल्य—कर्तव्य, त्याग, सेवा और राष्ट्रभक्ति—ही युवाओं को वैचारिक भटकाव से बचा सकते हैं। ग्रामीण भारत में नवाचार कर रहा युवा, खेल के मैदान में तिरंगा लहराता खिलाड़ी, और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करता उद्यमी ये सभी विवेकानंद के स्वप्न के साकार रूप हैं।
आज का युवा यदि केवल अधिकारों की नहीं, कर्तव्यों की भी भाषा सीखे; यदि सुविधा के साथ संयम और स्वतंत्रता के साथ अनुशासन को अपनाए, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता। विवेकानंद ने कहा था—“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।” यह लक्ष्य व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्र का पुनरुत्थान है।
इस युवा दिवस पर आवश्यकता है आत्ममंथन की। क्या आप अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा ले रहे है? क्या आप सनातन संस्कृति को बोझ नहीं, बल्कि शक्ति मान रहे है? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो भारत का भविष्य सुरक्षित ही नहीं, बल्कि स्वर्णिम है।
स्वामी विवेकानंद का सनातन मंत्र आज भी अमर है
आत्मबल से राष्ट्रबल, और राष्ट्रबल से विश्वमंगल।
यही युवा दिवस का सार है, और यही भारत की दिशा।
