बैंक, बाज़ार, सोना और भविष्य
राष्ट्र की बात
शीतल रॉय
क्या भारत किसी बड़े आर्थिक संकट के दौर में प्रवेश कर रहा है?
जब किसी देश का प्रधानमंत्री जनता से यह कहे कि “सोना कम खरीदिए, खासकर भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री तब यह सिर्फ एक सामान्य आर्थिक सलाह नहीं हो सकती,यह उस आर्थिक संकट का संकेत भी हो सकती है जिसे सरकार खुलकर कहना नहीं चाहती, लेकिन आगाह भी कर रही, भारत जैसे देश में, जहां सोना सिर्फ गहना नहीं बल्कि सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की गारंटी माना जाता है, वहां ऐसी अपील अपने आप में बड़े सवाल पैदा करती है।
- सवाल उठना स्वाभाविक है … क्या देश आर्थिक दबाव की तरफ बढ़ रहा है?
- क्या सरकार को डर है कि बढ़ता सोना आयात रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी पड़ सकता है?
- या फिर यह संकेत है कि बाजार और बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ रहा है?
इतिहास गवाह है भारत में जब भी अनिश्चितता बढ़ती है, जनता सोने की तरफ भागती है। क्योंकि लोगों को लगता है कि शेयर बाजार गिर सकता है, बैंक डूब सकते हैं, नौकरी जा सकती है, लेकिन सोना संकट में भी कीमत बचाए रखता है। यही कारण है कि आर्थिक असुरक्षा का पहला असर सर्राफा बाजार में दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री की अपील को सरकार “राष्ट्रहित” और “उत्पादक निवेश” से जोड़ सकती है। आपको तर्क यह दिया जाएगा कि यदि पैसा सोने में बंद हो जाएगा, तो उद्योग, उत्पादन और रोजगार की गति धीमी पड़ेगी। जबकि सरकार चाहती है कि जनता का पैसा बैंक, म्यूचुअल फंड, स्टार्टअप और इंफ्रास्ट्रक्चर में जाए ताकि अर्थव्यवस्था चलती रहे। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर और चिंता करने वाला है।
यदि जनता बैंक से ज्यादा भरोसा सोने पर कर रही है, तो यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक संकट का भी संकेत है। इसका अर्थ है कि आम नागरिक अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है। वह अपनी मेहनत की कमाई को ऐसी जगह रखना चाहता है जहां भले ही सरकारें बदलें, बाजार टूटें या वैश्विक संकट आए तब भी जनता का भरोसा सुरक्षित रहे।
यही वह बिंदु भी है जहां विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश करेगा विपक्ष कहेगा कि यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत है, तो फिर जनता को सोना खरीदने से रोकने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या सरकार को विदेशी मुद्रा संकट, बढ़ते आयात बिल और गिरते रुपये का भय सता रहा है? क्या यह आने वाले आर्थिक संकटों की शुरुआती चेतावनी है?
हालांकि अभी स्थिति को सीधे आर्थिक आपदा कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि सरकार की ऐसी अपीलें तब ही आती हैं जब आर्थिक संतुलन को लेकर अंदरूनी चिंता बढ़ने लगती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब देशों में मुद्रा पर दबाव बढ़ा, लोग बैंक से ज्यादा सोने पर भरोसा करने लगे। युद्ध जैसे विषम परिस्थितियों में भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां बैंक, बाजार, सोना और भविष्य इन चारों के बीच भरोसे की लड़ाई चल रही है। सरकार चाहती है कि जनता “सिस्टम” पर भरोसा करे और जनता अब भी “सोने” को अंतिम सुरक्षा कवच मानती हैऔर शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सच है क्योकि देश आर्थिक संकट से पहले भरोसे के संकट से गुजरता है।
जब जनता तिजोरी को बैंक से ज्यादा सुरक्षित समझने लगे, तब समझ जाइये की अब बहस सिर्फ सोने की नहीं, बल्कि भविष्य की शुरू हो चुकी है।
