कॉकरोच’ क्रांति या डिजिटल तमाचा
राष्ट्र की बात
शीतल रॉय ✍🏻
एक जज द्वारा की गयी कॉकरोच की कथित टिप्पणी से कॉकरोच क्रांति शुरू हो गयी है, देश के लाखों युवाओं ने उसे अपमान नहीं बल्कि प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। देखते ही देखते “कॉकरोच जनता पार्टी” सोशल मीडिया पर विस्फोट बन गई। लाखों फॉलोअर्स, करोड़ों व्यूज़ और हर पोस्ट में सिस्टम के खिलाफ उबलता गुस्सा। यह कोई और नही बल्कि यह वही युवा है जिसे कभी “देश का भविष्य” कहा गया था।लेकिन आज वही युवा पूछता है भारत की तर्ज पर पूछ रहा है की
डिग्रियां हैं…लेकिन नौकरियां नहीं।परीक्षाएं हैं…लेकिन पेपर लीक भी हैं।भर्ती के विज्ञापन हैं…लेकिन नियुक्तियां वर्षों तक अटकी हैं।और जब यही युवा सवाल पूछता है, तो उसे कभी एंटी कभी नकारात्मक,तो कभी “कॉकरोच” जैसी उपमाओं से देखा जाता है।यही वजह है कि आज यह ट्रेंड मजाक नहीं रहा।यह व्यवस्था के चेहरे पर डिजिटल तमाचा है।

सत्ता ने सोशल मीडिया को प्रचार का हथियार बनाया था, लेकिन अब वही सोशल मीडिया युवाओं के हाथ में डिजिटल क्रांति का औजार बन चुका है।आज का युवा सड़क पर कम, स्क्रीन पर ज्यादा लड़ रहा है।उसके मीम अब पोस्टर हैं।उसके वायरल वीडियो अब भाषण हैं।
और उसकी ट्रोलिंग अब राजनीतिक प्रतिरोध की नई भाषा बन चुकी है। खतरा यह नहीं कि “कॉकरोच जनता पार्टी” ट्रेंड कर रही है…बल्कि खतरा यह है कि देश का पढ़ा-लिखा युवा अब व्यवस्था का मजाक उड़ाने लगा है।
जब किसी सरकार से उम्मीद खत्म होने लगती है, तब व्यंग्य जन्म लेता है।और जब यही व्यंग्य जनआंदोलन बन जाए, तो समझ लीजिए भीतर बहुत गहरा असंतोष पनप रहा है।
भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में सबसे मजबूत पकड़ युवाओं और डिजिटल नैरेटिव पर बनाई थी। लेकिन अब वही डिजिटल दुनिया सवाल पूछ रही है
डिग्री लेकर भी बेरोजगार क्यों?
भर्तियां अदालतों में क्यों अटकी हैं?
हर परीक्षा विवाद में क्यों बदल रही है?
भले ही यह गुस्सा फिलहाल मीम्स में दिख रहा है, लेकिन इतिहास गवाह है
हर बड़ी राजनीतिक क्रांति पहले मजाक ही लगती है।
देश किस दिशा में जा रहा है?
यह ट्रेंड लोकतंत्र के लिए भी आईना है।
यदि युवा खुद को सिस्टम में सम्मानित महसूस नहीं करेगा, तो वह व्यवस्था पर भरोसा नहीं, व्यंग्य करेगा।
“कॉकरोच जनता पार्टी” शायद चुनाव न भी लड़े…
लेकिन उसने सत्ता, न्याय व्यवस्था और राजनीति, तीनों को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया है।और सबसे खतरनाक बात यह है कि
यह गुस्सा संगठित नहीं स्वाभाविक है।
कोई नेता नहीं, एल्गोरिद्म इसे चला रहा है। यह सत्ता के लिए आईना और चुनौती है क्योंकि डिजिटल क्रांतियां जब स्वतः जन्म लेती हैं, तब उन्हें रोकना मुश्किल ही नही नामुमकिन भी हो जाता है।
