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Saturday 9 May 2026
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मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की उपेक्षा और सत्ता के गलियारों की खामोशी

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की उपेक्षा और सत्ता के गलियारों की खामोशी

शीतल रॉय✍🏻

राजनीति में कई बार शब्द नहीं बोले जाते, बल्कि संकेत दिए जाते हैं। मंच पर उपस्थिति, कार्यक्रम सूची में नाम और सार्वजनिक आयोजनों में स्थान—यही संकेत सत्ता के असली भाव बताते हैं। हालिया घटनाक्रम में कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को लेकर जो दृश्य उभरा है, वह केवल एक व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही असहजता की ओर इशारा करता है।
26 जनवरी के झंडावंदन जैसे संवैधानिक और प्रतीकात्मक कार्यक्रम में एक वरिष्ठ मंत्री का नाम सूची में शामिल न होना साधारण प्रशासनिक चूक नहीं कहा जा सकता। यह उपेक्षा का वह संकेत है, जिसे राजनीति समझने वाले पंडित भलीभांति पढ़ लेते हैं। सवाल यह नहीं कि कैलाश विजयवर्गीय का नाम झंडावंदन की सूची में क्यों शामिल नही है, बल्कि, सवाल यह है कि उन्हें अलग क्यों रखा गया।
इसके बाद मंत्री द्वारा जारी किया गया वह आदेश—जिसमें पारिवारिक मित्र के निधन का हवाला देकर सभी कार्यक्रम निरस्त किए गए राजनीतिक गलियारों में एक मौन असंतोष के रूप में देखा गया। सार्वजनिक जीवन में दशकों की यात्रा तय कर चुके नेता जब खामोशी चुनते हैं, तो उसके पीछे पीड़ा भी होती है और संदेश भी। चर्चाएँ यह भी कहती हैं कि वास्तविक कारण सार्वजनिक बयान से भिन्न हैं, पर राजनीति में कई बार सच शब्दों से नहीं, परिस्थितियों से झलकता है।
कैलाश विजयवर्गीय उन नेताओं में हैं जिन्होंने संगठन के लिए दिन-रात एक किया। वे सत्ता की राजनीति से अधिक कार्यकर्ता की राजनीति के प्रतीक रहे हैं,ऐसे नेता जो चौबीस घंटे जनता और संगठन की चिंता करते रहे। ऐसे व्यक्ति की बार-बार उपेक्षा होना केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि राजनीतिक मर्यादा का प्रश्न है।
लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, पर मतभेद यदि सम्मानहीनता में बदल जाएँ, तो वह व्यवस्था को कमजोर करते हैं। वरिष्ठता, अनुभव और संघर्ष को नज़रअंदाज़ करना यह तात्कालिक सत्ता संतुलन को तो साध सकता है, पर दीर्घकाल में यह विश्वास के क्षरण का कारण बनता है।
आज यह सवाल केवल कैलाश विजयवर्गीय का नहीं है। यह सवाल हर उस कार्यकर्ता का है जिसने वर्षों तक निष्ठा के साथ संगठन को सींचा कि क्या समर्पण का प्रतिफल उपेक्षा ही है?
राजनीति केवल सत्ता है संचालन नहीं, संवेदनशीलता की परीक्षा भी है।
और जब सत्ता संकेतों में अपमान करने लगे, तब वह स्वयं अपने आधार को कमजोर करती है।
यह समय टकराव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संवाद का है।क्योंकि लोकतंत्र में जनता के लिए सबसे बड़ा संदेश भाषण नहीं, व्यवहार होता है।

जयवर्गीय की उपेक्षा और सत्ता के गलियारों की खामोशी

शीतल रॉय✍🏻

राजनीति में कई बार शब्द नहीं बोले जाते, बल्कि संकेत दिए जाते हैं। मंच पर उपस्थिति, कार्यक्रम सूची में नाम और सार्वजनिक आयोजनों में स्थान—यही संकेत सत्ता के असली भाव बताते हैं। हालिया घटनाक्रम में कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को लेकर जो दृश्य उभरा है, वह केवल एक व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही असहजता की ओर इशारा करता है।
26 जनवरी के झंडावंदन जैसे संवैधानिक और प्रतीकात्मक कार्यक्रम में एक वरिष्ठ मंत्री का नाम सूची में शामिल न होना साधारण प्रशासनिक चूक नहीं कहा जा सकता। यह उपेक्षा का वह संकेत है, जिसे राजनीति समझने वाले पंडित भलीभांति पढ़ लेते हैं। सवाल यह नहीं कि कैलाश विजयवर्गीय का नाम झंडावंदन की सूची में क्यों शामिल नही है, बल्कि, सवाल यह है कि उन्हें अलग क्यों रखा गया।
इसके बाद मंत्री द्वारा जारी किया गया वह आदेश—जिसमें पारिवारिक मित्र के निधन का हवाला देकर सभी कार्यक्रम निरस्त किए गए राजनीतिक गलियारों में एक मौन असंतोष के रूप में देखा गया। सार्वजनिक जीवन में दशकों की यात्रा तय कर चुके नेता जब खामोशी चुनते हैं, तो उसके पीछे पीड़ा भी होती है और संदेश भी। चर्चाएँ यह भी कहती हैं कि वास्तविक कारण सार्वजनिक बयान से भिन्न हैं, पर राजनीति में कई बार सच शब्दों से नहीं, परिस्थितियों से झलकता है।
कैलाश विजयवर्गीय उन नेताओं में हैं जिन्होंने संगठन के लिए दिन-रात एक किया। वे सत्ता की राजनीति से अधिक कार्यकर्ता की राजनीति के प्रतीक रहे हैं,ऐसे नेता जो चौबीस घंटे जनता और संगठन की चिंता करते रहे। ऐसे व्यक्ति की बार-बार उपेक्षा होना केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि राजनीतिक मर्यादा का प्रश्न है।
लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, पर मतभेद यदि सम्मानहीनता में बदल जाएँ, तो वह व्यवस्था को कमजोर करते हैं। वरिष्ठता, अनुभव और संघर्ष को नज़रअंदाज़ करना यह तात्कालिक सत्ता संतुलन को तो साध सकता है, पर दीर्घकाल में यह विश्वास के क्षरण का कारण बनता है।
आज यह सवाल केवल कैलाश विजयवर्गीय का नहीं है। यह सवाल हर उस कार्यकर्ता का है जिसने वर्षों तक निष्ठा के साथ संगठन को सींचा कि क्या समर्पण का प्रतिफल उपेक्षा ही है?
राजनीति केवल सत्ता है संचालन नहीं, संवेदनशीलता की परीक्षा भी है।
और जब सत्ता संकेतों में अपमान करने लगे, तब वह स्वयं अपने आधार को कमजोर करती है।
यह समय टकराव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संवाद का है।क्योंकि लोकतंत्र में जनता के लिए सबसे बड़ा संदेश भाषण नहीं, व्यवहार होता है।




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