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Wednesday 4 February 2026
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जब नेता बोले और सिस्टम बहरा हो जाए तो शब्द संतुलन खो देते है

 

मैंने कैलाश विजयवर्गीय को पिछले बीस वर्षों से इंदौर के विकास की बात करते देखा है। मंच हो या मंत्रालय, उनके शब्दों में हमेशा शहर के लिए बेचैनी रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों से उनके भाषणों में एक और बात बार-बार सुनाई देने लगी—“अधिकारी मेरी नहीं सुनते”। यह कोई राजनीतिक जुमला नहीं था, यह एक अनुभवी नेता की पीड़ा थी, जिसे शायद बहुत कम लोगों ने गंभीरता से लिया।
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद जो कुछ हुआ, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का जो बयान आया मैं उसका कतई समर्थन नही करती, लेकिन उसे देखकर मुझे लगा कि यह केवल एक बयान का मामला नहीं है, यह उस बेबसी का विस्फोट है, जो लंबे समय से भीतर दबाई जा रही थी। जब बार-बार चेतावनी देने के बावजूद सिस्टम न जागे, जब मंत्री के आदेश फाइलों में दब जाएँ और जब जिम्मेदारी सिर्फ मंचों तक सीमित रह जाए—तो शब्द अपना संतुलन खो बैठते हैं।

मैं यह साफ़ करना चाहती हूँ—कैलाश विजयवर्गीय की ज़ुबान से निकले शब्द संवेदनहीनता कम बल्कि वह लाचारी की चीख थे। एक ऐसा नेता, जिसके पास अनुभव है, इच्छाशक्ति है, लेकिन अधिकार छीन लिए गए हों—उसकी स्थिति सबसे त्रासद होती है। न वह चुप रह सकता है, न कुछ कर सकता है।

कई बार उन्होंने सार्वजनिक मंचों से कहा कि अधिकारी सुनते नहीं हैं, व्यवस्थाएँ उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेतीं। यह सिस्टम पर सीधा आरोप था, लेकिन सिस्टम हमेशा की तरह खामोश रहा बहरा रहा।और आज वही खामोश सिस्टम, कैलाश विजयवर्गीय के बयान के शब्दों की आड़ लेकर खुद को बचाने में लग गया है।

मुझे सबसे ज़्यादा आश्चर्य इस बात की है कि इस पूरे मामले में सिस्टम फिर बच निकला। मौतों की जिम्मेदारी बयान पर डाल दी गई, जबकि असली दोषी वही व्यवस्था है, जिसने ज़हरीला पानी लोगों के घरों तक पहुँचाया। अधिकारी सुरक्षित हैं, फाइलें सुरक्षित हैं—केवल एक व्यक्ति कटघरे में है।

यह लेख किसी बयान को सही ठहराने का प्रयास नहीं है। यह उस मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश है, जहाँ एक नेता रोज़ अपमान, उपेक्षा और असहायता से जूझता है। लोकतंत्र में इससे बड़ा अन्याय क्या होगा कि काम करने की इच्छा रखने वाले को काम करने से रोका जाए, और फिर असफलता का ठीकरा भी उसी पर फोड़ दिया जाए।
इंदौर की यह त्रासदी हमें यह सिखाती है कि

बयान से ज़्यादा खतरनाक सिस्टम की खामोशी होती है।
क्योंकि जब सिस्टम नहीं सुनता,
तो जन प्रतिनिधि के शब्द चीख बन जाते हैं।
और जब चीख को भी अपराध बना दिया जाए,
तो असली अपराधी हमेशा ही बच निकलते हैं।

शीतल रॉय




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