राष्ट्र की बात
शीतल रॉय
नलों में ज़हर, फाइलों में सच:
यह आपदा नही सुनियोजित हत्याएं …
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतें सत्ता की संवेदनहीनता और स्वक्ष इंदौर की हकीकत बया कर रही आखिर इंदौर किस अपराध की सज़ा भुगत रहा है?
इंदौर—जिसे पुरस्कारों, सरकारी विज्ञापनों और सरकारी दावों में “स्वच्छता का सिरमौर” बताया जाता है— वही इंदौर आज दूषित पानी से हुई मौतों के कारण कटघरे में खड़ा है। सवाल सीधा है—क्या यह मौतें हादसा हैं या व्यवस्था द्वारा की गई हत्याएँ?नलों से बहता ज़हरीला पानी, अस्पतालों में तड़पते नागरिक और श्मशान घाटों तक पहुँची मासूमों की बेबसी—यह किसी आपदा की तस्वीर नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की भयानक परिणति है। जिन हाथों में शहर की सेहत की जिम्मेदारी थी, वही हाथ आज अपराधबोध से भी खाली हैं।
सरकार और प्रशासन का रवैया और भी भयावह है। इतनी मौतों के बाद भी औपचारिक बयान, दिखावटी जांच और आश्वासनों की घिसी-पिटी भाषा—यही सत्ताधारियों का जवाब है। क्या मानव जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उसे फाइलों में दबाकर आगे बढ़ जाया जाए?
इंदौर में जलापूर्ति व्यवस्था वर्षों से बीमार है—
सीवेज से जुड़ी पाइपलाइनें,
बिना जांच के जल वितरण,
और शिकायतों को अनसुना करने की पुरानी प्रशासनिक संस्कृति।
यह सब किसी को पता नहीं था, ऐसा कहना सरासर झूठ है। यदि सब जानते थे और फिर भी चुप रहे, तो यह लापरवाही नहीं, सुनियोजित अपराध है।और प्रशानिक हत्या भी …
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इतनी मौतें होने के बाद भी अब तक किसकी जिम्मेदारी तय हुई?
कौन जिम्मेदार अधिकारी निलंबित हुआ?
किस नेता ने स्तीफा दिया ?
किस मंत्री ने घटना की नैतिक जिम्मेदारी ली?
या फिर इंदौर की मौतें भी अन्य सरकारी आंकड़ों की तरह “समायोजित” कर दी जाएँगी?
सरकारी मुआवजा न्याय नहीं है।
जांच के आदेश समाधान नहीं हैं।
निगम कमिश्नर को हटाकर क्या दोषियों को बचाने की साजिश रची जा रही जब तक दोषियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, तब तक हर नागरिक असुरक्षित है।
इंदौर की जनता अब मौन नहीं है। यह केवल पानी का संकट नहीं, यह लोकतंत्र की जवाबदेही की परीक्षा है।
स्वच्छ शहर का तमगा अब सवालों के घेरे में है।
क्योंकि जब पानी ही ज़हर बन जाए,
तो विकास एक खोखला नारा रह जाता है।
