“संघ शताब्दी वर्ष: हिन्दू चेतना का राष्ट्रव्यापी जागरण”
सनातन का शंखनाद -आत्म निर्माण के पथ पर हिन्दू

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देशभर में आयोजित हुए हिन्दू सम्मेलन केवल उत्सव मात्र नहीं थे,बल्कि हिन्दू चेतना के शंखनाद थे। यह आयोजन उस सोए हुए आत्मबोध को जगाने का प्रयास थे, जिसे दशकों तक भ्रम, भय और विभाजन की राजनीति के बीच दबाया गया। हजारों हिन्दुओं का एक साथ एकत्र होना और हर जाति के लोगों का एक पंक्ति में बैठकर भोजन करना—यह दृश्य अपने आप में एक स्पष्ट संदेश था: हिन्दू अब बंटा हुआ नहीं, बल्कि जागरूक और संगठित है।
सनातन संस्कृति का मूल उद्देश्य कभी जाति-भेद नहीं रहा, बल्कि व्यक्ति निर्माण रहा है। लेकिन दुर्भाग्यवश, लम्बे समय तक हिन्दू समाज को यही पढ़ाया गया कि वह कमजोर है, पिछड़ा है और अपने ही मूल्यों को लेकर अपराधबोध से ग्रस्त रहे। आज के सम्मेलन इस मानसिक गुलामी को तोड़ने का प्रयास हैं। यह स्पष्ट घोषणा है कि हिन्दू समाज अब आत्महीन नहीं, आत्मबोध से युक्त है।

जब समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ बैठते हैं, तो यह केवल समरसता का प्रतीक नहीं, बल्कि उस झूठे नैरेटिव पर करारा प्रहार है, जिसने हिन्दू समाज को भीतर से तोड़ने का काम किया। यह आयोजन बता रहे हैं कि जाति के नाम पर हिन्दू को बाँटने की राजनीति अब अधिक दिन नहीं चलने वाली।
संघ की शताब्दी यात्रा यह सिखाती है कि राष्ट्र की लड़ाई संसद में नहीं, बल्कि संस्कारशालाओं में लड़ी जाती है। सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था बदल सकती है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य तभी सुरक्षित होता है, जब व्यक्ति राष्ट्र के लिए जीना सीखता है। संघ का कार्य इसी बुनियाद पर खड़ा है—नारे नहीं, निर्माण; विरोध नहीं, संस्कार; भीड़ नहीं, चरित्रवान व्यक्ति।
आज जब विश्व वैचारिक अराजकता, सांस्कृतिक आक्रमण और पहचान के संकट से जूझ रहा है, तब हिन्दू समाज का जागरण केवल उसका अधिकार नहीं, बल्कि उसका कर्तव्य है। जो समाज अपने मूल को भूल जाता है, वह इतिहास नहीं बनता—वह इतिहास में खो जाता है।
संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में समूचे देश मे होने वाले ये हिन्दू सम्मेलन स्पष्ट संकेत हैं कि अब समय आ गया है— एक, संगठित और संस्कारित हिन्दूओं का।
क्योंकि जब हिन्दू जागता है, तभी राष्ट्र सुरक्षित होता है।
