मणिकर्णिका की ‘मणि’ टूटने से उजागर हुआ प्रशासनिक असंवेदनशीलता का सच
राष्ट्र की बात
शीतल रॉय
शिव की नगरी काशी का मणिकर्णिका घाट केवल एक निर्माण-स्थल नहीं, वह भारत की सनातन चेतना का धड़कता हुआ हृदय है। यही वह महाश्मशान है, जहाँ मृत्यु भी मोक्ष का द्वार बन जाती है। लेकिन आज उसी पवित्र स्थल पर “विकास” के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने व्यवस्था की संवेदनशीलता और नीयत—दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
पुनरुद्धार कार्य के दौरान ऐतिहासिक चबूतरे और लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति पर बुलडोजर चलना कोई साधारण प्रशासनिक घटना नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें विरासत को बाधा और आस्था को तकनीकी औपचारिकता समझ लिया गया। पाल समाज और तीर्थ पुरोहितों का आक्रोश स्वाभाविक है, क्योंकि जिनके जीवन, परंपरा और स्मृति इस घाट से जुड़ी है, उनसे बिना संवाद किए धरोहर को ढहा देना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही प्रश्नचिह्न है।
हालांकि प्रशासन का यह कहना कि “मूर्तियां सुरक्षित हैं”, यह जवाब सवालों को शांत नहीं करता, बल्कि उन्हें और गहरा करता है। क्या विरासत केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित होती है? क्या किसी ऐतिहासिक चबूतरे, प्रतीक और स्थान की आत्मा को बुलडोजर से अलग किया जा सकता है? यदि मूर्ति सुरक्षित थी, तो फिर उसे ध्वस्त करने की नौबत ही क्यों आई?
यह वही मणिकर्णिका घाट है, जिसे न्याय की देवी अहिल्याबाई होल्कर ने लोकहित और धर्मभाव से संवारा था। उनका शासन वैभव प्रदर्शन का नहीं, बल्कि लोक-उपयोगी कार्यों और न्याय व्यवस्था का उदाहरण था। आज जब सरकारें उनकी विरासत को स्मरण करने के लिए समारोह आयोजित कर रही हैं, तब उसी विरासत पर यह प्रहार दोहरे चरित्र को उजागर करता है श्रद्धांजलि शब्दों में, और उपेक्षा कर्मों में। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास वह नहीं जो स्मृति मिटा दे। पुनरुद्धार वह नहीं, जो इतिहास को रौंद दे। काशी जैसे नगर में विकास का अर्थ होना चाहिए संरक्षण के साथ संवर्धन, न कि ध्वस्तीकरण के साथ सौंदर्यीकरण।
मणिकर्णिका की ‘मणि’ केवल एक संरचना नहीं थी, वह काशी की आत्मा का अंश थी। उसका टूटना केवल पत्थरों का गिरना नहीं, बल्कि व्यवस्था के विवेक का दरकना है। यदि आज भी सबक नहीं लिया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह प्रश्न करेंगी कि जब विरासत खतरे में थी, तब शासन और प्रशासन किस विकास की नींव रख रहे थे?
