रिंकेश बैरागी
समाप्त हुए आंदोलन से शांति कितनी आई है यह समय चक्र में पता चलेगा कि, यह स्थायी शांति है या अस्थायी ठहराव। हमारा भारत विविधताओं से भरा है, जिसमें राष्ट्र, समाज, जनजीवन, और लोकतंत्र से जुड़े इतने मुद्दे है, जिन्हें संतुलित कर जनहित में आगे बढ़ते रहना बहुत बड़ी चुनौती होती है। पेपर लीक से जुड़ा यह आंदोलन जिसने सरकार को तीखे रुख दिखाए और अपने आप में मर्यादा को पार किया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर, हिंसा प्रदर्शन करने वालों ने देश के युवाओं में भ्रम पैदा किया और विपक्ष और भारत विरोधी शक्तियों ने छात्रों के कंधे पर बंदुक रखकर चलाई।
आंदोलन शुरु हुआ और विपक्ष के साथ-साथ इस आंदोलन में देश विरोधी शक्तियां उभर कर सामने आने लगी, मुद्दों से भटकते हुए आंदोलनकारियों ने धर्म की पटरी बिछा दी, भगवान श्री राम का मजाक बनाया, तो अल्लाह का गुणगान गाया, अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए देश के प्रधानमंत्री को अपशब्द कहे, इतना ही नहीं अपनी सारी मर्यादा लांघ गए छात्रों ने संसद मार्च करते हुए पुलिस के विरोध पर पत्थर बरसाए। हिंसा और विरोध के बीच में राष्ट्र विरोधियों की शक्ति ने युवाओं के साथ मिलकर अराजकता फैलाना शुरु कर दी और इसी आंदोलन के खराब दृश्य को देखते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने अपना त्यागपत्र सरकार को सौंप दिया।
कांग्रेस, आप, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल श्रेय लेने के अपने-अपने प्रयत्न में वांगचूक और अभिजीत दीपके का नाम लेने से परहेज करते रहे। आंदोलन के समय में विपक्षियों का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास दिखाई दिया। श्रेय लेने पर टकराव की आहट सबसे पहले आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सुनाई दी। कांग्रेस के धरना प्रदर्शन में समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी मौजुद हुए, जिसमें गिरफ्तारी को बड़े संघर्ष के रुप में प्रस्तुत किया गया। अगले दिन संसद में कांग्रेस और सपा के बीच खिंचाव की स्थिति दिखी जिससे उस एकजुटता के प्रदर्शन की हवा निकल गई।
आंदोलन समाप्त होने पर विपक्ष में इसका श्रेय लेने की होड़ दिखाई दी, विशेष तौर पर कांग्रेस इसका सीधा लाभ लेने के लिए प्रयास में रही, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का बयान आया कि, यह विपक्ष के एकजुटता की शक्ति है जिसने छात्रों के हित में संसद से सड़क तक आवाज उठाई है। राहुल गांधी ने कहा कि, उन युवाओं को बधाई जो लोकतंत्र, संविधान और भविष्य की रक्षा के लिए सड़क पर उतरे। प्रियंका वाड्रा ने राहुल गांधी को इसका श्रेय देते हुए कहा कि, वे लंबे समय से छात्रों के जुड़े मुद्दे उठा रहे थे। उन्होंने इसके लिए एनएसयुआई और यूथ कांग्रेस की भूमिका को भी सराहा यहां तक की उत्तर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में जीत की मिठाई बांटी गई।
विरोध-प्रतिरोध का अधिकार मौलिक है, किंतु शांतिपूर्ण नागरिक जीवन का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। आंदोलन में असहमती के ऐसे तरिकें अपनाने चाहिए जो किसी भी अवरोध को पैदा न करें। आमरण अनशन, सड़क जाम, भड़काउ बयानबाजी भी टकराव को बढ़ाते हुए तार्किक लोकतांत्रिक संवाद को बिगाड़ देती है। जेन-जी की अभिव्यक्तियां भी इस आंदोलन की महत्वपूर्ण पहलु रही। नई पीढ़ी ने हास्य व्यंग्य को आत्मसात करते हुए राजनीतिक संदेशों को व्यंग्य के साथ प्रस्तुत किया। कहा जाता है कि, संयमी बनों, नकारत्मक नहीं। व्यंग्य और हास परिहास के साथ भाषा की मर्यादा को लांघने वाले जेन-जी को यह पता होना चाहिए कि, सभ्य समाज में अभद्रता और अशिष्टता के लिए कोई स्थान नहीं होता। जेन-जी को आंदोलन के अंदर अभिव्यक्ति और अनादर में अंतर समझना आवश्यक होगा। भाषा में अभद्रता और अशिष्टाचार का उपयोग करके किसी ने भी सभ्य समाज या नए विचार की स्थापना नहीं की है और न ही सभ्य समाज की किसी कुप्रथा को ऐसे तरिके से समाप्त किया जा सकता है।
ध्यान रहे धर्मेंद्र प्रधान ने त्यागपत्र सौंपने से पहले कहा था कि, जंतर-मंतर पर पैदा हुई स्थिति का लाभ राष्ट्रविरोधी ताकतें न उठा लें, इसीलिए वे इस्तिफां सौंप रहे हैं। शिक्षा मंत्री के त्याग पत्र के साथ ही सरकार सीजेपी के संसद मार्च के दौरान की गई हिंसा के जिम्मेदार तत्वों के विरोध में एफआईआर वापस लेने में सहमत हुई उस पर यह प्रश्न खड़ा होता है कि, क्या हिंसा और उत्पात मचाने वाले अराजक तत्वों को भी छोड़ दिया जाएगा। इसका उत्तर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के संकेत दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि, साजेपी के इस आंदोलन में हिंसा की घटनाओं को देखते हुए निष्पक्ष जांच जरुरी है, और इस जांच में पुलिस पर हमले की जांच भी शामिल होगी। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि, पुलिस दर्ज एफआईआर में जांच जारी रख सकती है, परंतु किसी भी प्रदर्शनकारी छात्र के विरोध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। वहीं आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण नहीं होगा। इसका अर्थ स्पष्ट है कि आंदोलन के नाम पर हिंसा करने वाले आअपराधी बचेगे नहीं। आदेश के अनुसार 18 वर्ष से कम बच्चों को साधारण बांड पर तत्काल छोड़े यदि उनका कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है। सीजेपी प्रदर्शनकारियों को छोड़ने की मांग कर रही है जबकि सरकार स्पष्ट है कि जो गैर सामाजिक तत्व अराजकता फैला रहे थे उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।
इस आंदोलन से न केवल जेन-जी बल्कि सभी पीढ़ियों के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न होना चाहिए कि, क्या किसी पक्ष के लिए यह जीत के जश्न का अवसर है या फिर सभी के लिए गंभीर आत्मचिंतन का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में इतनी परिक्षाओं के पेपर लीक हुए है जिनकी गिनती करना कठिन है। केन्द्रीय परिक्षाओं के साथ राज्यों की परिक्षाओं के भी पेपर लीक हुए है इसलिए राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाकर मामले की इतिश्रि नहीं कर सकते। सभी को मिलकर समस्या का समाधान करना होगा। क्या… पेपर लीक और परिक्षाओं में नकल करना समाज का चारित्रिक और नेतिक पतन नहीं है। क्या किसी सरकार या राजनीतिक दलों, विपक्षी या फिर सीजेपी, के पास समाज के इस चारित्रिक और नेतिक पतन को रोकने उसे जड़ से समाप्त करने का कोई सहज, सरल उपाय है।
हालांकि श्रेय लेने की होड़ ने विपक्षियों की एकजुटता के ऊपर फिर से प्रश्न चिन्ह लगा दिया है, और धरनारत छात्रों ने एक सभ्य समाज में रहते हुए अभिव्यक्ति की अपनी भाषा को मर्यादा के पार जाकर अभद्र और अशिष्ट दर्शाकर अनादर किया।
बहरहाल, भूल को स्वीकार करना उसे सुधारने की पहली सीढ़ी होती है, गलत के साथ गलत और सही के साथ सही व्यवहार करना चाहिए। दिल्ली में प्रदर्शनकारी भारतीय संसद में घुसना चाहते थे, ताकि पुलिस इन आंदोलनकारियों पर गोलिया चलाए, फिर राष्ट्र विरोधी ताकतें पूरे देश में आगजनी करे और विश्व में भारत सरकार को तानाशाह घोषित करे, परंतु यह होने नहीं दिया गया। युवा देश विरोधी ताकतें, विपक्ष और वामपंथियों के झांसे में न आए, नेरेटीव की इस लड़ाई में जहां सरकार सही है वहां सरकार का पूरा साथ दें।
