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Friday 31 July 2026
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जंतर-मंतर आंदोलन ने उठाए नए सवाल: युवाओं की भाषा और संस्कारों पर गंभीर बहस

जन्तर मन्तर पर लगभग एक महीने तक चले आंदोलन में राजनीति के अतिरिक्त जिस तत्व ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा वह था किशोर – युवा वर्ग का अमर्यादित आचरण! अत्यन्त भद्दी और अश्लील गालियां, वक्तव्य, उतने ही अश्लील पोस्टर्स और वैसे ही विचार। ऐसा भी नहीं था कि अपवादस्वरूप कोई दो चार युवा इस भाषा का उपयोग कर रहे थे। स्पष्ट दिख रहा था कि यह एक सहज, जीवन का हिस्सा बन चुकी भाषा शैली है जिसका एक बड़े किशोर-युवा वर्ग में सामान्यीकरण हो चुका है।
ये क्यों हो रहा है? हमारे जैसे 80-90 के दशकों के पूर्व जन्म लिए लोगों के लिए यह अविश्वसनीय है कि हमारी ही नई पीढ़ियां इस स्तर पर आ पहुंची हैं। अत्यन्त सरलता से हम यह कह सकते हैं कि हमने तो अपने बच्चों को ऐसा कुछ नहीं सिखाया था। हम तो हमारे बड़ों का, शिक्षकों का सभी का सम्मान करते थे। आज भी उनका उल्लेख आदर के साथ ही करते हैं। हमने कभी ऐसी भाषा का उपयोग नहीं किया। कम से कम सार्वजनिक रूप से, हमारे ही नेतृत्व के प्रति, उनके दमनकारी व्यवहार के बावजूद कभी भी ऐसी गाली गलौच नहीं हुई। इन्दिरा जी ने आपातकाल लगा दिया। लाखों को जेल में ठूंस दिया। वी पी सिंह द्वारा पिछड़ा वर्ग का आरक्षण जब घोषित किया गया तब वृहद स्तर पर आंदोलन हुए थे। पूरे देश में युवा सड़कों पर उतर आए थे। आत्मदाह तक कर लिया गया था। परन्तु ऐसी भाषा का उपयोग तब भी देखने में नहीं आया था। उत्तरप्रदेश की मुलायम सरकार द्वारा गोलीबारी कर कईं राम सेवकों को मौत के घाट उतर दिया गया था। परन्तु नारे “जय श्रीराम” और “राम लला हम आयेंगे, मन्दिर वहीं बनाएंगे” के ही लगते रहे।
तब फिर, आज के युवा यहाँ तक कैसे पहुंचे हैं, इसमें किसका दोष है इस सम्बंध में कुछ बिंदुओं पर विचार करना आवश्यक है।
1950 के दशक से भारत में सरकार द्वारा छोटे परिवार का आग्रह किया जाना प्रारम्भ हुआ। शीघ्र ही छोटे परिवार सुशिक्षित होने के प्रमाण के रूप में देखे जाने लगे। 60-70 के दशक समाप्त होते होते, छोटे परिवार मध्यम वर्ग में सामान्य हो चुके थे। “हम दो हमारे दो” सिर्फ नारा न रह कर आम जीवन शैली बन चुका था। दो ही बच्चे होने से उन्हें उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना आर्थिक रूप से सरल होने लगा। मध्यमवर्गीय परिवारों से बच्चे, बड़ी संख्या में इंजीनियर, डॉक्टर्स, CA आदि बनने लगे। यहीं से शहरीकरण और प्रतिभा पलायन भी प्रारम्भ हुआ। हमने IIT तो बना लिए परन्तु उन्हें देने के लिए नौकरियां नहीं थी। देश छोड़ कर बाहर जाना ही विकल्प था। सामान्य शैक्षणिक योग्यता वाले भारत में ही बड़े शहरों की ओर जाने को विवश थे।
1990 के दशक में नरसिम्हा राव की सरकार द्वारा व्यापार के द्वार जनसामान्य के लिए खोल दिए गए। नौकरिया उत्पन्न हुईं, संपन्नता बढ़ने लगी और साथ साथ शहरीकरण भी। युवा अपने गांव, परिवार और परिवेश से दूर जा कर सर्वथा नए माहौल में बसने लगे। संपन्नता और स्थायी आय के सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में उपभोगवाद का राक्षस भी समाज को निगल रहा था। बाजार नित नए उत्पादों से भर गए। 24×7 TV के माध्यम से विज्ञापन घरों में बच्चों तक पहुंचने लगे। महंगे ब्रांड्स और उनसे जुड़ा स्टेटस समाज में बढ़ने लगा।
अटल जी की सरकार के दौरान बैंक के कर्ज सरलता से मिलने लगे। जिस विशाल मध्यम वर्ग के लिए स्वयं का घर एक ऐसा स्वप्न था जो कदाचित ही पूरा होता था, उसके युवा बच्चे 30-35 वर्ष की उम्र में ही अपने नीडों का निर्माण करने लगे। इस दौरान नारीवाद का बोलबाला बढ़ता रहा। महिलाओं द्वारा उच्च शिक्षा ग्रहण करना आम हो गया और उसके पश्चात उनका नौकरियां कर धन अर्जित करना भी सामान्य हो गया। निश्चित ही इससे संपन्नता और अधिक बढ़ी और उपभोग भी! अब बड़े मकान और चमचमाती गाड़ियां खरीदी जाने लगी और ऊंची EMI जीवन का हिस्सा बन गई।
इस संपन्नता और आधुनिक जीवन शैली की कीमत अदा की इस दौरान जन्म ले रहे बच्चों ने! बहुत बड़ी संख्या में बच्चे अपनी नानी-दादियों से दूर हो गए। माता पिता दोनों कार्यरत थे और आने जाने का समय और कार्यालयीन समय मिला कर लगभग 10-12 घण्टे बाहर रहते थे। बच्चों के साथ बिताया जाने वाला समय प्रतिदिन दो-तीन घण्टों और वर्ष में एक सप्ताह की छुट्टी के दौरान के “क्वालिटी टाइम” तक सिमट गया। पैरेंटिंग की परिभाषा महँगे स्कूलों और कोचिंग क्लासेज तक सीमित हो गई।
महँगाई, उपभोग और समय के संतुलन के चलते परिवार दो बच्चों से एक बच्चे पर आ गए। बच्चों के साथ परिवार की संवादहीनता बढ़ती गई। नई माँओं को दादी नानी की परवरिश में दोष नजर आने लगे। और स्वयं के पास समय था नहीं। ऐसे में ‘बच्चा घर‘ आदि का चलन बढ़ता गया। अब बच्चों का मानसिक विकास परिवार के माध्यम से कम और विदेशों से नियंत्रित कार्टून फिल्म, एनिमे, TV सीरियल, पत्रकारिता और सेलेबरिटीज की जीवन शैली के माध्यम से अधिक होने लगा। सिंचन, पोकेमॉन, डोरेमॉन आदि की भाषा शैली, व्यवहार और आचरण बच्चों के मस्तिष्क को प्रभावित करने लगे।
इसी दौरान सस्ते डेटा और मोबाइल उपयोग की क्रान्ति घटित हुई। डोरेमॉन और सिंचन देख कर बड़े हुए बच्चे इन्स्टा, OTT और stand up comedy के सहारे युवा होने लगे। डेढ़ मिनट की रील, likes और views जीवन के उद्देश्य बन गए। गालियां अश्लील होने की जगह विनोद का माध्यम बन गई और सड़क से उठ कर ड्राइंग डाइनिंग तक पहुंच गई। फिल्मों में अनुराग कश्यप जैसे निर्देशकों ने गालियों की बौछार को कला का जामा पहना कर पेश किया। Reels और AI की बाढ़ में ठोस अध्ययन भी पीछे छूट गया। अध्ययनशील बच्चों का अनुपात सदा ही सीमित रहा है वह और अधिक सिमट गया। सूचनाएं ही ज्ञान बन गईं। बढ़ती संपन्नता ने धन अर्जित करने की मजबूरी भी कम कर दी और आधुनिकता का स्थान उच्छृंखलता और बेलगाम व्यवहार ने ले लिया।
जन्तर मन्तर पर युवाओं का फूहड़ और स्तरहीन प्रदर्शन इसी क्रमागत पारिवारिक मूल्यों के ह्रास की साक्षात परिणिति है। इतने गैर जिम्मेदार युवा जीवन के किसी भी क्षेत्र में गम्भीर और अनुशासित प्रयत्न कर पाएंगे यह सम्भव नहीं लगता।
परन्तु अभी भी सब कुछ हाथों से छूटा नहीं है। आज भी समाज का बड़ा हिस्सा इस मानसिक दिवालियेपन से बचा हुआ है। आवश्यकता है उसे बचाए रखने की। कुछ बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता नजर आती हैं –
* अपने बच्चों से संवाद स्थापित करिए।
* कर्ज आधारित जीवन शैली से और अति उपभोगवाद से बचिए।
* बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के साथ जितना सम्भव हो उससे भी अधिक समय बिताने दीजिए। उनका घर में होना ही महत्वपूर्ण अन्तर है।
* बच्चों को अकेले रहने, घर से दूर जाने और सामाजिक प्रतिष्ठा भर के लिए विदेश जाकर पढ़ने बसने के लिए प्रोत्साहित मत कीजिए।
* बच्चों को जन्म देना और उनका लालन पालन करना एक आनन्द है, झन्झट नहीं।
* सही उम्र में माता पिता बनना और इस आनन्द का उपभोग करना पब और क्लब में बिताए पलों से कही अधिक स्थाई और महत्वपूर्ण है।
पुनश्च, अपने बच्चों से आप ही बातें करें, अन्यथा कोई और करेगा। फिर वो बच्चे वैसा व्यवहार नहीं करेंगे जैसा आप करते थे और चाहते हैं कि वे भी करें।
श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर 
27/07/2026



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