18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 21.7 करोड़ मतदाता हैं। यानी हर पांच में से एक मतदाता युवा है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा शक्ति-संतुलन है।
सत्येंद्र प्रताप सिंह
झुकती है दुनियां झुकाने वाला चाहिए सीजेपी नेता अभिजीत दीपके का यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की उस सच्चाई की ओर संकेत करता है कि कोई भी सरकार तब तक अपने फैसले नहीं बदलती, जब तक उसे पर्याप्त जनदबाव महसूस न हो। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर वह कौन सी ताकत थी जिसने सरकार को यह कदम उठाने पर मजबूर किया?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है। यदि इसे राजनीतिक घटनाक्रम के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह उस नई वास्तविकता की ओर संकेत करता है जिसमें भारत का युवा मतदाता सत्ता की राजनीति का सबसे प्रभावशाली कारक बनकर उभर रहा है। यह सवाल अब केवल इतना नहीं है कि एक मंत्री क्यों गया, बल्कि यह है कि क्या सरकार ने पहली बार संगठित युवा असंतोष की राजनीतिक शक्ति को स्वीकार किया?
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की छवि एक ऐसी सरकार की रही है जो कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी अपने निर्णयों पर अडिग रहती है। 2014 के बाद अनेक आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के बावजूद सरकार ने अधिकांश मामलों में अपना रुख नहीं बदला। ऐसे में यदि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा व्यापक छात्र आंदोलन और जनदबाव के बीच हुआ, तो स्वाभाविक रूप से यह चर्चा शुरू हुई कि आखिर इस बार सरकार को ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा? इसका सबसे बड़ा उत्तर है—युवा मतदाता।
भारत के लोकतंत्र में आज लगभग 96.9 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं। इनमें 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 21.7 करोड़ मतदाता हैं। अर्थात हर पांच में से एक मतदाता युवा है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा शक्ति-संतुलन है। यही वर्ग प्रतियोगी परीक्षाएं देता है, रोजगार की तलाश में है, डिजिटल माध्यमों पर सबसे अधिक सक्रिय है और जनमत निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यह किसी राजनीतिक दल के झंडे तले शुरू नहीं हुआ। इसकी जड़ में परीक्षा प्रणाली पर भरोसे का संकट, पारदर्शिता की मांग और भविष्य की चिंता थी। लाखों छात्रों और उनके परिवारों ने इसे अपना मुद्दा माना। सोशल मीडिया ने इस असंतोष को देशव्यापी विमर्श में बदल दिया। परिणामस्वरूप सरकार के सामने केवल विपक्ष का नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास का प्रश्न खड़ा हो गया।
राजनीतिक दल जानते हैं कि 21.7 करोड़ युवा मतदाता किसी भी चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते हैं। भारत की चुनावी व्यवस्था में अक्सर कुछ प्रतिशत वोटों का अंतर सत्ता बदल देता है। ऐसे में यदि युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा किसी मुद्दे पर एक दिशा में सोचने लगे, तो उसका प्रभाव केवल चुनाव प्रचार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सरकार की नीतियों और राजनीतिक रणनीति पर भी पड़ता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज का युवा पहले की तुलना में अधिक जागरूक, अधिक डिजिटल और अधिक मुखर है। वह केवल जाति, धर्म या परंपरागत राजनीतिक पहचान के आधार पर मतदान नहीं करता, बल्कि रोजगार, शिक्षा, परीक्षा, अवसर और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय बनाता है। यही कारण है कि शिक्षा से जुड़ा यह विवाद केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक चुनौती बन गया।
हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि भारतीय राजनीति पूरी तरह बदल गई है। किसी एक घटना से इतिहास नहीं बदलता। लेकिन यह घटना एक संकेत अवश्य देती है कि आने वाले वर्षों में जो भी राजनीतिक दल युवाओं की आकांक्षाओं, शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता को गंभीरता से नहीं लेगा, उसे राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अंततः केवल एक व्यक्ति की विदाई नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में युवा शक्ति के बढ़ते प्रभाव का प्रतीक बनकर सामने आया है। यदि यह प्रभाव आने वाले समय में भी इसी तरह संगठित और मुद्दा-आधारित बना रहता है, तो संभव है कि भविष्य की भारतीय राजनीति में सबसे निर्णायक नारा न जाति का होगा, न धर्म का, बल्कि युवा, रोजगार और अवसर का होगा।
