बेलूर मठ
जहाँ इतिहास आज भी साँस लेता है…
शीतल रॉय, कोलकाता
कुछ यात्राएँ पर्यटन नहीं होतीं, वे आत्मा का जागरण होती हैं। आज की बेलूर मठ यात्रा भी ऐसी ही एक अनुभूति है। वहाँ पहुँचकर ऐसा नहीं लगता कि आप किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश कर रहे हैं, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि आप भारत की उस चेतना में प्रवेश कर रहे हैं जिसने पूरे विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया।
बेलूर मठ के मुख्य द्वार से भीतर कदम रखते ही एक ऐसी शांति आपका स्वागत करती है, जिसे शब्दों में बाँधना संभव नहीं। मन का कोलाहल स्वतः शांत होने लगता है। ऐसा लगता है मानो इस भूमि का प्रत्येक कण तप, त्याग और साधना की ऊर्जा से स्पंदित है। यह केवल मौन नहीं, बल्कि वह दिव्य निस्तब्धता है जो भीतर सोई हुई चेतना को जगा देती है। गेट से कुछ ही दूरी पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस का भव्य मंदिर दिखाई देता है। जो पहली दृष्टि में ही उसकी वास्तुकला मन को ठहरा देती है और मन मे अनगिनत सवाल पैदा करती है, मंदिर में हिंदू, इस्लामी और ईसाई स्थापत्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है,जो किसी पुस्तक का सिद्धांत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का सजीव स्वरूप है। यह मंदिर मानो पूरी दुनिया से कहता है कि धर्म दीवारें खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि हृदयों को जोड़ने के लिए है। यही वह जीवंत विचार था जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु से ग्रहण कर विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया।
मंदिर से आगे बढ़ते ही एक साधारण-सा दिखने वाला आम का वृक्ष दिखाई देता है। लेकिन जैसे ही यह ज्ञात होता है कि इसे स्वयं स्वामी विवेकानंद ने लगाया था और इसी आम के पेड़ की छाया में बैठकर वे अपने शिष्यों और भक्तों से संवाद करते थे, तब वह वृक्ष केवल वृक्ष नहीं रह जाता बल्कि वह इतिहास का जीवंत साक्षी बन जाता है। उसकी शाखाएँ आज भी मानो उस युग की स्मृतियों को सँजोए खड़ी हैं। उसकी छाया में खड़े होकर सहज ही लगता है कि अभी स्वामीजी अपने तेजस्वी नेत्रों के साथ वहीं बैठे हैं और युवाओं से कह रहे हैं “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको।” उस पेड़ को निहारते वक़्त समय जैसे एक क्षण के लिए ठहर जाता है।

फिर आता है वह स्थान, जहाँ पहुँचकर मन अनायास ही श्रद्धा से झुक जाता है और वह है स्वामी विवेकानंद का कक्ष। सादगी से भरा यह कमरा किसी राजमहल से कहीं अधिक विराट लगता है। उसकी खिड़कियाँ माँ गंगा की ओर खुलती हैं। बहती हुई गंगा को निहारते हुए सहज ही कल्पना होती है कि इन्हीं खिड़कियों से स्वामीजी ने अनगिनत प्रभात देखे होंगे, भारत के भविष्य के स्वप्न बुने होंगे और विश्व को मानवता का संदेश देने का संकल्प लिया होगा। कहने को तो उस कक्ष की दीवारें आज मौन हैं, पर उनका मौन भी बोलता है। वहाँ खड़े होकर ऐसा लगता है कि विचार कभी मरते नहीं, वे युगों तक प्रेरणा बनकर जीवित रहते हैं।
और फिर… माँ गंगा का वह पावन घाट।
सीढ़ियों पर बैठते ही समय जैसे अपना अस्तित्व खो देता है। गंगा की कल-कल, मंदिरों की घंटियाँ, संध्या आरती की लौ और हवा में घुली प्रार्थना… सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं जहाँ मन स्वयं ईश्वर के निकट पहुँच जाता है। यही वह घाट है जिसने स्वामी विवेकानंद के चिंतन, उनके संकल्प, उनकी साधना और भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण को अपनी आँखों से देखा है। और यहाँ की लाइब्रेरी में इतिहास पढ़ा नहीं जाता महसूस किया जाता है।
आज स्वामी विवेकानंद शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, पर बेलूर मठ का प्रत्येक कोना उनकी उपस्थिति का अहसास कराता है। वह आम का वृक्ष, वह कक्ष, वह गंगा तट, वह मंदिर—सब मिलकर कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी जाती नहीं, वे अपने विचारों के रूप में युगों तक जीवित रहती हैं।
यह बेलूर मठ केवल ईंट और पत्थरों का समूह नहीं है। यह भारत की आत्मा का मंदिर है। यह वह स्थान है जहाँ सनातन केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि मानवता बनकर प्रकट होता है; जहाँ राष्ट्रभक्ति केवल नारा नहीं, बल्कि साधना बन जाती है; जहाँ सेवा ही धर्म है और आत्मविश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति।
बेलूर मठ से लौटते समय मन में एक ही भाव था,यदि भारत को समझना है, तो उसके इतिहास को केवल पुस्तकों में मत खोजिए; बेलूर मठ आइए। जहाँ इतिहास आज भी साँस लेता है, गंगा आज भी उसे गुनगुनाती है, और स्वामी विवेकानंद आज भी हर आगंतुक के हृदय में यह विश्वास जगा देते हैं कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देने वाली सनातन चेतना है।
