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Thursday 12 February 2026
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सृजन और संहार का साश्वत शिव

सृजन और संहार का साश्वत शिव

राष्ट्र की बात

शीतल रॉय ✍🏻

महाशिवरात्रि शिव की आराधना का महापर्व शिव मतलब सृष्टि के सृजनकर्ता और संहारक भी क्या कभी आपने यह सोंचा की आखिर शिव को ही क्यों संहारक कहा गया है, जबकि अन्य देवताओं ने समय समय पर धर्म की रक्षा के लिए दैत्यों का वध किया है भगवान विष्णु तो धर्म की रक्षा के लिए बार बार अवतार लेते है और असुरों का वध कर धर्म की स्थापना करते है, लेकिन उनको संहारक नही कहा गया सिर्फ शिव को ही संहारक कहा जाता है ।तो पहले हम यह समझते है कि वध और संहार में अंतर क्या है।
संहार का मतलब है सर्व व्यापक विनाश या सम्पूर्ण नाश। यह केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि यह सम्पूर्ण प्रवृत्ति या पूरी सृष्टि के विनाश, युग परिवर्तन के लिए किए गए स्तर को संहार कहा जाता है जो शिव ही कर सकते है। जबकि
वध प्रायः व्यक्तिगत या युद्ध-संदर्भ में प्रयुक्त होता है। जैसे रावण वध, कंस वध। यहाँ वध में धर्म की रक्षा के लिए किया गया अंत दर्शाया गया है। जबकि
संहार सृष्टि-चक्र का हिस्सा है, इसलिए शिव को संहारकर्ता कहा जाता है। शिव का संहार विनाश नहीं, बल्कि सृजन के लिए आवश्यक परिवर्तन है जिसको ब्रह्मांडीय स्तर का परिवर्तन कहते है।
शिव को केवल संहार का देवता कहना भी अधूरा सत्य है। वे संहारक हैं,पर किसका? अन्याय का, अहंकार का, असंतुलन का। और इसी संहार की राख से जो सृजन का अंकुर फूटता है वही सृष्टि का निर्माण करता है।महादेव का तांडव विनाश का उत्सव नहीं, प्रकृति के संतुलन की घोषणा है। जब व्यवस्था जड़ हो जाती है, जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है, तब परिवर्तन अनिवार्य होता है और वही परिवर्तन शिव हैं।
समुद्र मंथन की कथा में निकला कालकूट विष केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि एक गहरा पर्यावरणीय रहस्य और सामाजिक संकेत है। विकास ने नाम पर हम जब भी प्रकृति का मंथन करते हैं जिसमे अत्यधिक दोहन, असीमित उपभोग और अनियंत्रित विकास के माध्यम से किया गया मंथन तो अमृत से पहले विष ही निकलता है। आज का प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जलसंकट क्या ये उसी मंथन के आधुनिक रूप नहीं हैं? फर्क बस इतना है कि तब शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था, और आज हम उस विष को वायु, जल और मिट्टी में फैला रहे हैं। जिसका खामियाजा दुनियां भुगत रही।
नीलकंठ का संदेश त्याग और उत्तरदायित्व का संदेश है। यह जानना चाहिए कि शिव ने विष को निगला नहीं, उसे कंठ में रोका—अर्थात संकट को स्वीकार किया, पर उसे भीतर तक फैलने नहीं दिया। यह संयम और सजगता का प्रतीक है। आधुनिक समाज के लिए यही सबसे बड़ी सीख है। विकास चाहिए, पर ऐसा जो प्रकृति को न लील जाए। उद्योग चाहिए, पर ऐसे जो नदियों को जहर न बनाएं। प्रगति चाहिए, पर ऐसी जो पृथ्वी का गला न घोंटे।
शिव का संहार सृजन का पूर्वार्ध है। शरद के बाद पतझड़ आता है, पर उसी पतझड़ से बसंत का मार्ग प्रशस्त होता है। प्रकृति स्वयं शिव का तांडव है पुराना पत्ता गिरता है ताकि नया उग सके। लेकिन जब मनुष्य कृत्रिम तांडव करता है वनों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का अतिक्रमण, पर्वतों का विस्फोट तो वह सृजन नहीं, स्थायी विनाश का बीज बोता है।
आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर के विष को पहचानें लालच, अति-उपभोग, असंवेदनशीलता। शिव की आराधना केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि जल संरक्षण का संकल्प है। केवल रुद्राभिषेक नहीं, बल्कि प्रदूषण के विरुद्ध संघर्ष है। केवल मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि जीवनशैली में परिवर्तन है। संहार अनिवार्य है, पर वह सृजन की भूमिका है। प्रश्न यह है कि हम किसका संहार करेंगे? प्रकृति का या अपने अहंकार का? यदि हमने अपने भीतर के विष को नियंत्रित कर लिया, तो सृजन का नया युग संभव है। अन्यथा, इतिहास गवाह है जब-जब संतुलन टूटा है, तांडव हुआ है।
महादेव की साधना हमें भय नहीं, चेतावनी देती है। समय है कि हम नीलकंठ की तरह विष को पहचानें, उसे रोकें, और प्रकृति के साथ नए सृजन का संकल्प लें। यही सच्ची शिवरात्रि है, यही शाश्वत संदेश।




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