जब शब्द ब्रह्म बनता है और चेतना संस्कार
ज्ञान-ऊर्जा से राष्ट्र-चेतना
शीतल रॉय✍🏻
जब-जब समाज की दिशा भटकती है, जब-जब शब्दों की मर्यादा टूटती है, जब-जब विचारों की धरती पर अज्ञान का कोहरा छा जाता है—तब-तब सनातन परंपरा माता सरस्वती का स्मरण कराती है। क्योंकि सरस्वती केवल “पुस्तक की विद्या” नहीं, वह चेतना की वह दिव्य ऊर्जा हैं जो मनुष्य को पशु-प्रवृत्ति से उठाकर विवेक, संस्कार और राष्ट्रधर्म की ऊँचाई पर स्थापित करती है। क्योकि माता सरस्वती उत्पत्ति नहीं प्रकटीकरण है,
माता सरस्वती की “उत्पत्ति” को समझना, वास्तव में ज्ञान के रहस्य को समझना है। वेद और शास्त्र बताते हैं कि सृष्टि का आरंभ नाद से हुआ ध्वनि से, स्पंदन से, चेतना से। यही नाद जब अर्थ बनता है, शब्द बनता है, शुचिता बनता है, तब उसे वाग्देवी कहा गया। इसीलिए सरस्वती कोई सीमित देवी-रूप नहीं; वे शब्द, स्वर, स्मृति, बुद्धि और सृजन का मूल स्रोत हैं।
पुराणों में उन्हें ब्रह्मा की मानस पुत्री कहा गया इसका संकेत स्पष्ट है की सृष्टि रचना मात्र से पूर्ण नहीं होती, उसे ज्ञान का अनुशासन चाहिए। शक्ति यदि दिशाहीन हो तो विनाश करती है, और ज्ञान यदि चरित्र-शून्य हो तो अहंकार बन जाता है। सरस्वती इन दोनों को सही मार्ग देती हैं—वाणी को मर्यादा, बुद्धि को विवेक और प्रतिभा को धर्म।
आज का युग सूचना का युग है—हर हाथ में स्क्रीन, हर आँख में हेडलाइन, हर दिमाग में शोर। लेकिन प्रश्न यह है सूचना बढ़ी है, तो विवेक क्यों घटा?
क्योंकि हमने सरस्वती को “ज्ञान” से घटाकर “डिग्री” बना दिया। सनातन कहता है विद्या वही है जो जीवन को ऊँचा करे, जो मनुष्य को असतो मा सद्गमय की यात्रा कराए; जो तमस को ज्योति में बदल दे, और अहं को शरणागति में।
यही सरस्वती की ज्ञान-ऊर्जा है जो भीतर उठती है तो वाणी कटु नहीं रहती, तर्क कुतर्क नहीं बनता, और प्रतिभा स्वार्थ नहीं बनती।उनके वाहन हंस का प्रतीक बताता है नीर-क्षीर विवेक—सही-गलत का अंतर। श्वेत वस्त्र बताते हैं ज्ञान का रंग सात्त्विक होता है। वीणा सिखाती है स्वर तभी मधुर होता है जब साधना और अनुशासन साथ हों। पुस्तक बताती है शास्त्र का प्रकाश जिसमें परंपरा की स्मृति और भविष्य की दिशा दोनों हैं।
बसंत पंचमी को केवल ऋतु-उत्सव कहना, उसके संदेश को छोटा करना है। यह दिन बताता है कि जीवन में बसंत वही है जहाँ ज्ञान पुष्पित हो। यह वह पर्व है जो विद्यार्थी की मेधा, कवि की कल्पना, वैज्ञानिक की जिज्ञासा और संत की साधना सबको एक ही धागे में बाँधता है आज, जब समाज में भाषा की हिंसा बढ़ रही है, जब विचारों में कट्टरता और संवाद में कटुता जगह बना रही है—तब बसंत पंचमी का संदेश और तीखा हो जाता है
वाणी को शुद्ध करो, विचार को संस्कारित करो, और बुद्धि को धर्म-पथ पर स्थिर करो।
राष्ट्र के लिए सरस्वती का अर्थ
राष्ट्र की रीढ़ केवल अर्थव्यवस्था नहीं होती उसकी आत्मा संस्कार होते हैं। जिस देश में गुरु का सम्मान, ग्रंथ की मर्यादा, भाषा की शुचिता और साधना की प्रतिष्ठा जीवित रहती है, वही राष्ट्र दीर्घकाल तक नेतृत्व करता है। यदि हम शारदा को विस्मृत करेंगे, तो हमारी पीढ़ियाँ “जानकार” तो होंगी, पर चरित्रवान नहीं। और चरित्र के बिना ज्ञान—दूरबीन तो देता है, दिशा नहीं।
आज आवश्यकता है कि हम सरस्वती को मंदिर की आरती तक सीमित न रखें; उन्हें विद्यालय की संस्कृति, घर की भाषा, और समाज के संवाद में स्थापित करें। ज्ञान-ऊर्जा का सच्चा उत्सव तब होगा जब हमारी वाणी में विनम्रता, कर्म में अनुशासन, और लक्ष्य में राष्ट्रहित होगा।
