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Wednesday 4 February 2026
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जब व्यवस्था सड़ती है तो महामारी जन्म लेती है? इतिहास एक बार फिर काल का रूप लेकर लौटा है

 

राष्ट्र की बात

शीतल रॉय

इंदौर: भागीरथपुरा महामारी को लेकर बैठकों का दौर जारी लेकिन नतीजा बिफल कारण ही नही पता कर पाए जिम्मेदार… हर बार एक ही सवाल ? क्या हर बार पानी ही दोषी है, या व्यवस्था की सड़ांध गहराई तक फैली है? इंदौर के लिए दूषित पानी से उपजा संकट कोई नया अध्याय नहीं है। इतिहास गवाह है कि यह पहला मौका नहीं जब इस शहर के नागरिकों को लापरवाही, उदासीनता और प्रशासनिक असंवेदनशीलता की कीमत अपने स्वास्थ्य से चुकानी पड़ रही हो।

याद कीजिए 1998 का वह भयावह दौर आज भी इंदौरवासियों की स्मृति में दर्ज है, जब कांग्रेस शासनकाल में सड़ी लाश का पानी पीकर सैकड़ों लोग बीमार पड़े थे। पानी की टंकी में एक शव इस कदर सड़ चुका था कि वह कंकाल में तब्दील हो गया, और उसका गल चुका मांस अनजाने में शहरवासियों के गले उतरता रहा। यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का वह काला सच था, जिसे कभी पूरी गंभीरता से स्वीकार ही नहीं किया गया।

विडंबना यह है कि इतिहास खुद को दोहराता प्रतीत हो रहा है। एक बार फिर इंदौर संक्रमण की चपेट में है, एक बार फिर आरोप दूषित पानी पर है और एक बार फिर सवालों के घेरे में व्यवस्था खड़ी है। तत्कालीन कांग्रेस महापौर मधुकर वर्मा के कार्यकाल में राजवाड़ा स्थित पानी की टंकी में कई दिनों तक एक व्यक्ति की लाश पड़ी रही, लोग वही पानी पीते रहे, बताया गया कि उस समय कोई जनहानि नहीं हुई।

यह तथ्य

अपने आप में गंभीर प्रश्न खड़े करता है—
क्या वास्तव में हर बार बीमारी का एकमात्र कारण पानी ही होता है?
या फिर इस बार संक्रमण के पीछे कोई और कारण भी छिपा है, जिसे ढकने के लिए ‘दूषित पानी’ को ढाल बनाया जा रहा है?
सुभाष चौक पानी की टंकी का वह मामला भी शहर पहले देख चुका है। हर बार टंकी, पाइपलाइन और जलापूर्ति विभाग कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन क्या कभी यह जांच हुई कि सिस्टम की निगरानी क्यों विफल रही? क्या जल परीक्षण, क्लोरीनेशन, निरीक्षण और आपात अलर्ट जैसी व्यवस्थाएँ केवल कागजों तक सीमित हैं?

यह प्रश्न अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रहा। यह जनस्वास्थ्य, जवाबदेही और प्रशासनिक नैतिकता का प्रश्न है। यदि 1998 में दोषियों पर कठोर कार्रवाई हुई होती, यदि जलप्रदाय व्यवस्था में पारदर्शिता लाई गई होती, तो शायद आज इंदौर फिर उसी मोड़ पर खड़ा न होता।

आज जरूरत है भावनात्मक बयानबाजी की नहीं, बल्कि निष्पक्ष, वैज्ञानिक और स्वतंत्र जांच की। यह जांच तय करे कि मौजूदा महामारी का कारण केवल दूषित पानी है या फिर खाद्य पदार्थ, सीवरेज लीकेज, औद्योगिक अपशिष्ट अथवा स्वास्थ्य तंत्र की कोई और चूक भी इसके पीछे जिम्मेदार है।

इंदौर अब प्रयोगशाला नहीं बन सकता, जहाँ हर बार लापरवाही के नतीजे जनता भुगते।
यदि व्यवस्था नहीं जागी, तो सवाल केवल पानी की शुद्धता पर नहीं, बल्कि शासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर उठते रहेंगे।
क्योंकि जब पानी नहीं, व्यवस्था सड़ती है—तो महामारी जन्म लेती है…




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