इंदौर में नलों का ज़हर और सत्ता का झूठ: हाईकोर्ट में बेनकाब हुआ पूरा सिस्टम
इंदौर के दूषित पानी कांड ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संकट प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार और सरकारी असफलता का जीवंत प्रमाण है। हाईकोर्ट में हुई सुनवाई ने सरकार के हर उस दावे की पोल खोल दी है, जो अब तक जनता को गुमराह करता रहा।
जब अदालत में कमेटी गठन की मांग उठी, तो सरकार की ओर से जवाब देने के बजाय समय मांगा गया। कोर्ट को कहना पड़ा कि पहले मुख्य सचिव का जवाब आने दिया जाए। सवाल यह है—जब लोग मर चुके हैं, तब भी सरकार को जवाब तैयार करने के लिए समय चाहिए?
अधिवक्ता अजय बागड़िया ने अदालत के सामने जो तथ्य रखे, वे किसी आरोप नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज़ों से निकली सच्चाई हैं। वर्ष 2017-18 की प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में 60 में से 59 पानी के सैंपल फेल होना यह साबित करता है कि यह ज़हर अचानक नहीं फैला, बल्कि सालों से पिलाया जा रहा था। यदि यह जानकारी सरकार के पास थी और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह लापरवाही नहीं—आपराधिक चुप्पी है।
नगर निगम की कथित जल जांच प्रयोगशाला पर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जांच हो ही नहीं रही। अधिवक्ता मनीष यादव का यह कहना कि केवल निलंबन या विभागीय जांच पर्याप्त नहीं है, पूरी तरह जायज़ है। जब निर्दोष नागरिकों की मौत हुई है, तब जिम्मेदारों पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए, न कि उन्हें सिस्टम के भीतर बचाया जाए।
सबसे शर्मनाक स्थिति तब उजागर हुई, जब यह सामने आया कि कोर्ट के आदेश के बावजूद भागीरथपुरा जैसे क्षेत्रों में टैंकर से साफ पानी तक नहीं पहुंचाया गया, और नगर निगम ने शपथपत्र पर झूठी जानकारी दी। यदि अदालत के सामने झूठ बोला जा रहा है, तो जनता के साथ क्या किया जा रहा होगा—इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
सरकार की प्राथमिकता साफ पानी नहीं, बल्कि फेक न्यूज का हवाला देकर सच्चाई दबाना बनती जा रही है। अधिवक्ता रितेश इनानी द्वारा रोजाना हेल्थ बुलेटिन की मांग बताती है कि शासन आंकड़े छुपा रहा है। पारदर्शिता से डर किसे है—यह सवाल अब सत्ता से पूछा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट द्वारा मुख्य सचिव को तलब किया जाना इस बात का संकेत है कि मामला निचले स्तर का नहीं, शीर्ष स्तर की जवाबदेही का है। 15 जनवरी को होने वाली सुनवाई केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह तय करेगी कि क्या शासन जनजीवन को लेकर गंभीर है या फिर इंदौर को एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करता रहेगा।
यह संपादकीय स्पष्ट चेतावनी देता है—
यदि इस बार भी जांच को समय, कमेटी और काग़ज़ों में उलझाया गया,
यदि दोषियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं हुए,
तो यह माना जाएगा कि सरकार स्वयं इस अपराध की साझेदार है।
इंदौर अब केवल साफ पानी नहीं मांग रहा—
वह सच, जवाबदेही और न्याय मांग रहा है।
